प्यार की हद..❤❤

अगर तुम्हे ये जानना है कि

कोई तुम्हारे प्यार में किस हद तक

गिर सकता है, तो यकीनन मैं इस वक़्त,

उस गर्त में हूँ, जहाँ से सिर्फ ऊपर ही उठा जा सकता है।

महिला शसक्तीकरण

वर्ष 2017 अगर किसी कारण से याद किया जाएगा तो वह केवल महिलाओं की वजह से,जिसके लिए सरकार ने काफी हद तक प्रशंसनीय कार्य किये।साथ ही साथ महिलाओं ने स्वयं भी बढ़ चढ़ कर प्रोत्साहित किया।

ऐसा पहली बार हुआ की डीटीसी बस चालक के रूप में एक महिला देखने को मिली,मेट्रो से लेकर ट्रेन तक हर जगह वह अव्वल दिखी।पहली बार कोई भारतीय महिला अंटार्कटिका गयी, पहली बार किसी ने दिल्ली से अमेरिका के तक के लिए उड़ान भरी,पहली बार दंतेवाड़ा जैसे नक्सली इलाके में महिलाओं ने ई रिक्शा चलाकर समाज को बहुत ही अच्छा संदेश दिया।पुष्पा साहू जैसी महिलाओं ने छत पर फल फूल उगाकर पूरे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया, जिसकी प्रशंसा खुद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने की।

अगर देखा जाय तो सरकार ने भी इसमें अच्छी भूमिका निभाई, पहली बार भोपाल रेलवे स्टेशन पर महिलाओं के लिए सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन की व्यवस्था की गयी। महाराष्ट्र के एक रेलवे स्टेशन के सभी कर्मचारी महिला है जोकि गर्व की बात है।साथ ही साथ मैटरनिटी लीव को बढ़ाना सरकार का सराहनीय प्रयास है।

इस दिशा में बॉलीवुड ने भी बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किये हैं, पिछले साल आयी कई फिल्में सिर्फ और सिर्फ महिला समाज को सुधारने के लिए बनाई गई।पिंक, लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का, दंगल,और टॉयलेट एक प्रेम कथा जैसी फिल्मों ने काफी हद तक पुरुषों की सोच बदल दी। लोगों को इस बात का एहसान हुआ कि महिलायें मात्र सेक्स ऑब्जेक्ट नही होती, उन्हें प्रोत्साहित किया जाय तो वह कुछ भी कर सकती है,कुछ भी।

खुशियाँ😂😂

किसी की पंक्तियों में पढ़ा था कि पैसों से खुशियाँ नही खरीदी जा सकती, लेकिन ये बात गलत लगी मुझे।वैशाली मेट्रो स्टेशन पर बैठे घंटो अपने प्रेमिका का इंतज़ार करते हुए मैं बोर हो रहा था, अचानक से मुझे कुछ बच्चे हाथों में फूल लिए हुए दिखाई दिए जोकि गुलाब बेच रहे थे।मैन भी 10 रुपए देकर अपनी प्रेमिका के लिए एक फूल खरीद लिया, समय बीतने के बाद जब वह नही आई तो मैं निराश होकर निकलने लगा,फिर से मुझे वही बच्चे दिखाई दिये और मैने उन्हें वो फूल प्यार से वापस कर दिया, जिससे उन्हें 10 रुपये और मिल गए और साथ मे एक फोटो भी खींच लिए उनकी। न ही उनकी खुशी का कोई ठिकाना था न ही मेरे। तब मुझे एहसास हुआ कि पैसों से खुशियां खरीदी जा सकती है।

भारतीय सिनेमा 2017

समाज मे बदलाव समय के साथ जरूर आता है, विचार बदलते हैं लोगों के, जिनमे कई बार हमारे सिनेमा क्षेत्र बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। पिछले सत्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब लोगों ने फ़िल्म निर्माताओं को यह एहसास दिलाया कि सिर्फ चटपटी प्रेम कथा को समझने के लिए हम थियेटर नही जाते, बल्कि टॉयलेट एक प्रेम कथा के माध्यम से खुद को बेहतर,और बेहतर बनाने जाते हैं।

हम अपनी विचारधारा में बदलाव देखते हैं जब हम पिंक जैसी फ़िल्म में यह समझते हैं कि न सिर्फ एक शब्द नही एक वाक्य होता है। लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का हमे एहसास दिलाती हैं कि स्त्रियां सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट नही होती,उन्हें भी स्वतंत्रता का अधिकार है, दंगल से हमे सीख मिली कि बेटियां सब कुछ कर सकती हैं उन्हें कमजोर समझना अपने माँ की तौहीन करना है क्योंकि वो भी किसी की बेटी है।

फ़िल्म निर्माताओं को यह बात भली भांति समझ मे आ गयी है कि लोग अब काल्पनिक प्रेम कथा देखने नही आते बल्कि कुछ अच्छा और ज्ञानवर्धक सीख लेने आते हैं, जिसपर सभी निर्माता अब ढंग से कार्य कर रहे हैं, पैडमैन जोकि सैनेटरी नैपकिन पर आधारित फिल्म है, इसका ज्वलंत उदाहरण है।